UGC Equity Regulations 2026 कितने सही और कितने गलत? क्या BJP अपनी राजनीतिक मंनशा में इस बार फेल हो गई या फँस गई है? क्या दिग्विजय सिंह ने BJP को उलझा दिया है सुप्रीम कोर्ट की एंट्री आइए समझते ….

UGC के नए नियम रोहित वेमुला की मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के कारण नए नियम बनाने पड़े। UGC ने कैंपस में भेदभाव के खिलाफ सख़्त और जवाबदेह व्यवस्था नियम बनाया है जो जाति, जेंडर, धर्म या समुदाय के आधार पर भेदभाव अब Serious Violation माना जाएगा। भारत सरकार यानि वर्तमान BJP सरकार को ऐसा क्यों लगा की UGC Equity Regulations में नए नियम बनाने चाहिए क्यों की देश में पहले से कैंपस कॉलेज में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए कई प्रभावी नियम थे इससे पहले ‘UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2012’ प्रभावी था जो मुख्य रूप से SC और ST छात्रों के भेदभाव पर केंद्रित थे। 2012 के नियम केवल ‘परामर्श’ (advisory) की तरह थे, जबकि 2026 के नियम कानूनी रूप से अनिवार्य (legally enforceable) हैं। पुराने नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था जिसे 2026 के नियमों में शामिल कर लिया गया है। सामान्य वर्ग के लोगों का कहना है नए नियम एकतरफा है पहले के नियमों में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था जिससे छात्र झूठी शिकायत करने से डरते थे। नए नियमों में झूठी शिकायत पर सिकायतकर्ता पर कोई कार्यवाही का प्रावधान नहीं है। ये नियम हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में Equal Opportunity-Equity Cell को लागू करना अनिवार्य होगा जहां छात्र और शिक्षक सीधे शिकायत कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नए नियमों पर अंतरिम रोक (stay) लगा दी है। और केंद्र सरकार को अगली सुनवाई 19 मार्च तक प्रभावी जवाब देने को कहा है।

UGC क्या है ?

UGC (University Grants Commission) की स्थापना 1956 में संसद के एक अधिनियम से किया गया था यह भारत सरकार की एक संस्था है जो उच्च शिक्षा (Higher Education) को नियंत्रित और विकसित करती है। इस का मकसद उच्चय शिक्षा को देखना नियम बनाना Higher Education में समय समय पर जरूरी कदम उठाना है जिससे सभी के अधिकारों का हित बना रहे, हर छात्र के लिए सम्मानजनक और समान शिक्षा का माहौल बने इसके लिए एक न्याय पूर्ण नियमों को बनाना है UGC के अधीन ये कार्य है यूजीसी क्या-क्या तय करती है:-

  • कौन-सी यूनिवर्सिटी मान्यता प्राप्त है
  • कॉलेजों की शिक्षा की गुणवत्ता
  • शिक्षकों की योग्यता
  • यूनिवर्सिटीज़ को फंड (अनुदान)
  • UGC शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) के तहत काम करता है।

जातिगत भेदभाव की शिकायतों में वृद्धि

कुछ वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में वृद्धि हुई है पिछले 5 वर्षों (2019-20 से 2023-24) में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की वृद्धि दर्ज की गई है भेदभाव की शिकायतों में वृद्धि का मतलब ये नहीं है की पहले भेदभाव नहीं होते थे आज के समय में सोशल मीडिया, लोगों की जागरूकता के कारण भेदभाव की शिकायतें कॉलेज या पुलिस के पास पहुँचती है जो पहले ज्यादातर नहीं पहुँचती थी जिससे सरकार के पास दिखाने के लिए डाटा नहीं होता था असल जीवन में भेदभाव कम होता जा रहा है परंतु जो भी घटनाएं आज के समय मे होती है वह सभी पुलिस तक पहुँच जाती है जिससे डाटा बढा है।

  • 2019-20 में 173 मामले सामने आए थे जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गए.
  • 2019 से 2024 के बीच UGC को 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों से कुल 1,160 शिकायतें प्राप्त हुईं।
  • सबसे ज्यादा मामले वाले राज्य: सामान्य अपराधों और दलितों के खिलाफ अत्याचारों की रिपोर्ट (PoA Act) के आधार पर उत्तर प्रदेश (UP) सबसे आगे रहा है, जहाँ कुल मामलों का लगभग 23.78% (12,287 मामले) दर्ज किया गया। इसके बाद मध्य प्रदेश का स्थान है कैंपस के विशिष्ट डेटा में केंद्रीय विश्वविद्यालयों और IITs/IIMs से भी बड़ी संख्या में मामले रिपोर्ट किए गए हैं।
  • वृद्धि का मुख्य कारण UGC अधिकारियों का कहना है कि यह वृद्धि कैंपस में भेदभाव बढ़ने के बजाय छात्रों के बीच जागरूकता बढ़ने के कारण है जिससे अब अधिक छात्र SC/ST सेल और समानता सेल (Equal Opportunity Cells) में अपनी शिकायतें दर्ज करा रहे हैं।

कितने मामले सही पाए गए:-

  • UGC के आंकड़ों के अनुसार, कुल 1,160 शिकायतों में से 1,052 शिकायतों का समाधान (Resolved) कर दिया गया है, जो कि 90.68% की निस्तारण दर (Disposal Rate) है।
  • हालांकि, लंबित (Pending) मामलों की संख्या भी बढ़ी है, जो 2019-20 में 18 थी और 2023-24 में बढ़कर 108 हो गई। लगभग मामले झूटे या फर्जी पाए गए है या किसी राजनीतिक रंजिस के कारण थी

समानता और भेदभाव विरोधी नियम (2026) इक्विटी कमेटी (Equity Committee) नए नियम क्या हैं?

  • OBC को शामिल करना: पहली बार अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव की कानूनी परिभाषा के दायरे में लाया गया है।
  • इक्विटी सेल (Equity Cell) हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक ‘समानता समिति’ या ‘इक्विटी सेल’ बनाना अनिवार्य होगा जो भेदभाव की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करेगी।
  • पारदर्शिता प्रवेश (Admission) और हॉस्टल आवंटन में पूरी तरह से पारदर्शिता बरतनी होगी। 

फायदे (Benefits)

  • सुरक्षा का दायरा बढ़ा: अब OBC छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी कैंपस में होने वाले उत्पीड़न या भेदभाव के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकेंगे।
  • दिव्यांग छात्रों को बड़ा लाभ होगा इन्फ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई दोनों में सुविधा बढ़ेगी। दिव्यांग अधिकार Rights of Persons with Disabilities Act 2016 के बाद भी सही न्याय नहीं मिल पाता था इस कटेगरी में सभी वर्ग के छात्र सामिल होंगे दिव्यांग छात्रों पर किसी भी टारगेट, हीनभावना से कहे या किए गए कार्य पर कार्यवाही होगी।
  • समान अवसर शैक्षणिक संस्थानों में सभी वर्गों के छात्रों को बराबर का सम्मान और अवसर मिलना सुनिश्चित होगा।
  • सख्त दंड: नियम न मानने वाले संस्थानों की सरकारी फंडिंग रोकी जा सकती है और उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।

नुकसान और विवाद (Drawbacks & Controversy)

  • सामान्य वर्ग की चिंता: उच्च जाति” (Upper Caste) (जैसे ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार, कायस्थ (Kayastha) नायर रेड्डी, कम्मा, लिंगायत आदि अन्य धर्मों में कुछ मुस्लिम, कुछ ईसाई, कुछ सिख जैन आदि आदि ) इसमें आते हैं। आलोचकों का तर्क है कि भेदभाव की परिभाषा से सामान्य वर्ग (General Category) को बाहर रखना उनके अधिकारों के साथ अन्याय हो सकता है।
  • दुरुपयोग का डर: कुछ वर्गों का मानना है कि इन सख्त नियमों का उपयोग झूठे आरोपों या आपसी रंजिश के लिए किया जा सकता है। नए नियम एक तरफा है पहले के नियमों में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था जिससे छात्र झूठी शिकायत करने से डरते थे। नए नियमों में झूठी शिकायत पर सिकायतकर्ता पर कोई कार्यवाही का प्रावधान नहीं है।
  • UGC के नए नियम में सामान्य वर्ग के छात्रों को अपराधी की तरह देखा गया है जो पूरी तरह से गलत है ऐसा लगता है सामान्य वर्ग का छात्र पढ़ाई नहीं अपराध करने आता है।
  • UGC के नए नियमों में अन्य वर्ग का छात्र अपने व्यक्तिगत लड़ाई को जातिगत लड़ाई दिखा कर अपराधी घोषित कर देगा सामान्य वर्ग के छात्र का जीवन अंधकार में चला जाएगा। छात्र जीवन में लड़ाई आम बात है यह एक ऐसा समय होता है जब छात्र उग्र स्वभाव के होते है क्यों की जीवन में अनुभव की कमी होती है।

रोहित वेमुला को UGC2026 से क्यों जोड़ा जा रहा है इन बिंदुओं से समझा जा सकता है

कौन थे रोहित वेमुला?

रोहित वेमुला हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (HCU) में पीएचडी के छात्र थे और अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (ASA) के सक्रिय सदस्य थे। वे कैंपस में सामाजिक न्याय और जातिगत मुद्दों पर आवाज उठाते रहते थे। अगस्त 2015 में एक छात्र संगठन (ABVP) के साथ हुए विवाद में रोहित और उनके चार साथियों को होस्टल से निकाल दिया गया। साथ ही छात्रवृत्ति रोक दी थी रोहित और उनके साथियों को कैंपस के मेस, कॉमन रूम, एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग में जाने से रोक दिया गया था। इसे छात्रों ने “आधुनिक अछूत प्रथा” (Dalit Ghetto) कहा था 17 जनवरी 2016 को रोहित ने छात्रावास के एक कमरे में आत्महत्या कर ली। अपने आखिरी खत में लिखा था, “मेरा जन्म एक घातक हादसा था” और “एक व्यक्ति की कीमत उसकी तात्कालिक पहचान तक ही सीमित कर दी गई है”। उनके समर्थकों ने इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई ‘संस्थानिक हत्या’ कहा।

  • सुप्रीम कोर्ट में याचिका: रोहित वेमुला की मां (राधिका वेमुला) और पायल तड़वी की मां ने 2019 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए एक मजबूत और जवाबदेह तंत्र बनाया जाए, क्योंकि 2012 के पुराने नियम प्रभावी नहीं थे।
  • न्यायालय का सख्त निर्देश: इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2025 में UGC को फटकार लगाई कि नियम सिर्फ “प्रतीकात्मक” नहीं होने चाहिए। कोर्ट ने UGC को 8 सप्ताह के भीतर सख्त और समयबद्ध नए नियम बनाने का आदेश दिया, जिसके परिणामस्वरूप UGC 2026 के नियम अस्तित्व में आए।
  • संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability): रोहित वेमुला के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठे थे। नए नियमों में इसी “संस्थागत विफलता” को ठीक करने के लिए ‘इक्विटी कमेटी’ और ‘इक्विटी स्क्वॉड’ का गठन अनिवार्य किया गया है, ताकि किसी छात्र को रोहित की तरह अकेला न पड़ना पड़े।
  • शिकायत निवारण में तेजी: रोहित वेमुला केस के बाद यह महसूस किया गया कि भेदभाव की शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। नए 2026 के नियमों के अनुसार, अब भेदभाव की किसी भी शिकायत का निपटारा अधिकतम 30 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है।
  • विस्तृत दायरा: रोहित के मामले के बाद उठी मांगों को देखते हुए नए नियमों में न केवल SC/ST बल्कि OBC छात्रों को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया है, जिसे यूजीसी के नए नियमों में स्पष्ट किया गया है। 
  • इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए ‘समानता नियमों (Equity Regulations) 2026’ पर रोक (Stay) लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है ये नियम समाज को फिर से पुरानी जातिगत बेड़ियों में जकड़ेंगी, फिलहाल पुराने (2012 के) नियम ही प्रभावी रहेंगे।

बीजेपी अपने ही जाल में फँसती नजर आ रही है ?

UGC Equity Regulations 2026 के नए नियम के आने के बाद देश मे सामान्य वर्ग का बड़े स्तर पर बिरोध सुरू हो गया है क्यों की बीजेपी का कोर वोट बैंक सामान्य वर्ग है भारत में सामान्य वर्ग की आबादी 24% से 30% के बीच होने का अनुमान है जो लगभग 80% बीजेपी के साथ है बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर विरोध किया है सोशल मीडिया में भारी विरोध हो रहा है वहीं SC, ST, OBC, इस बिल के समर्थन में है उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में 2027 में चुनाव है अगर विरोध ऐसा ही रहा तो उत्तर प्रदेश बीजेपी के हाथ से निकल जाएगा क्यों की सामान्य वर्ग ही बीजेपी के लिए हर स्तर पर चुनावी माहौल बनाता है बाकी अन्य जातियाँ बीजेपी के साथ सिर्फ चुनावी समीकरणों के कारण आती है विपक्ष ऐसे ही किसी बड़े मौके का इंतजार कर रहा है क्यों की देश में सामान्य वर्ग का राजनीतिक महत्व सभी राजनीतिक पार्टियां जानती है। प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के चलते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हिन्दू विरोधी के रूप में देखे जा रहे है इस घटना से एक बड़ा हिन्दू समूह योगी और बीजेपी से नाराज है। बीजेपी समय समय पर कुछ ऐसा करती रहती जिससे बाद में उससे माफी माँगनी पड़ती है जैसे किसान आंदोलन आदि। बीजेपी सामान्य वर्ग के नेताओ को आगे कर बयान दिला रही है की मोदी जी ने (EWS stands for Economically Weaker Section) दे कर आपको बहुत कुछ दिया है पर नेता भूल जाते है दोनों बाते अलग अलग है और ऐसे घोल-मोल के बयान बीजेपी के काम नहीं आएंगे 2024 के लोकसभा में 240 सीटें मिली थी कहीँ  ऐसा न हो अगली बार बीजेपी 200 पार न जा पाए। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह UGC नियमों के संसदीय समिति के अध्यक्ष थे यूजीसी नियमों को बनाते-बनाते एक ऐसी बॉल डाली है जिसमे बीजेपी खुद रन आउट हो गई है। बिपक्ष को कितना फाइदा होगा ये तो समय बताएगा परंतु वर्तमान स्थित में बीजेपी की हालत “साँप और छछूँदर” जैसी दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के सहारे बीजेपी डैमेज कंट्रोल करने में लगी है। बीजेपी बंटेंगे तो कटेंगे” नारे की अपार सफलता के बाद, “जब तक हिन्दुओ को आपस में तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं” नई स्कीम लेकर आई है।

निष्कर्ष (Conclusion)

संवैधानिक में सभी के अधिकारों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है, परंतु जब सरकार किसी वर्ग विशेष को आकर्षित करने के लिए एकपक्षीय नियम बनाती है, तो ऐसे नियम समाज और देश को तोड़ने वाले होते हैं। ऐसे नियमों से समाज टूटेगा जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। भारत की जाति व्यवस्था एक कमजोर कड़ी है समाज में जाति आधारित लड़ाई होती रहती है और इस पर विश्व का ध्यान है कि कैसे भारत को तोड़ा जाए। यही वह कमजोर कड़ी है जिसमें विश्व के बड़े-बड़े देशों की रुचि (Interest) है। इसी का फायदा उठाकर धर्मांतरण, आतंकवाद और भारत विरोधी अभियानों में फंडिंग कर भारत को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है। भारत सरकार को इस कड़ी को मजबूत करने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। भारत में जाति आधारित राजनीति पर अंकुश लगाकर राजनीतिक दलों को जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण करने से रोकने के लिए चुनावी सुधारों पर विचार करना चाहिए, क्योंकि नेता व्यक्तिगत फायदे के लिए देश को जातियों में तोड़कर जातिगत लाभ उठाते हैं। कोई भी कानून बुरा नहीं होता जब तक उसके पीछे की मंशा खराब न हो। यदि सरकार या समाज को लगता है कि सामान्य समाज के लोग ही दूसरी जातियों के साथ भेदभाव करते हैं, तो हर समाज के लिए स्कूल, कॉलेज और शिक्षण संस्थान अलग-अलग बनाए जाएँ, जिससे आपस में लड़ाइयां और भेदभाव होने का डर खत्म हो जाएगा। सच तो यह है कि भारत में ‘जाति’ है जो कभी ‘जाती’ नहीं है। जाति का लाभ सभी को चाहिए परंतु जातिगत आधारित व्यवस्था के खिलाफ सभी दिख रहे ये दोहराचारित्र समाज और देख लिए घातक है।

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