ईरान पर हमाल कहीं तीसरे युद्ध की सुरुवात तो नहीं, पूरी दुनियाँ एक युद्ध के जाल में फसा हुआ है ?

व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किसी देश पर हमला करना उस देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर हमला है। परंतु अमेरिका जैसे देश पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता; अमेरिका का अपना स्वार्थ पूरा होना चाहिए। इस वर्ष वेनेजुएला के बाद ईरान दूसरा देश है जिस पर अमेरिका ने हमला किया है। यह सभी कमजोर देशों के लिए एक सबक है कि बिना ताकत और बिना हथियार के दुनिया में आप केवल दूसरों के सहारे ही जीवित रह सकते हैं।

अमेरिका पूरी दुनिया की समस्या बनता जा रहा है। रूस और चीन को छोड़कर कई देश या तो अमेरिका के प्रभाव में हैं या उसके दबाव में काम कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, अफ्रीका के कई देश और भारत जैसे तमाम देश इस संघर्ष में ऐसे बैठे हुए हैं जैसे महाभारत में चीरहरण के समय पाँचों पांडव मूक-बधिर होकर बैठे थे।

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र (UNO) की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि यह संगठन केवल अमेरिका के लिए काम करता है और उसके इशारों पर चलता है। जिस तरह से अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, यदि ईरान ने किसी अन्य देश पर ऐसा हमला किया होता तो अब तक संयुक्त राष्ट्र कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका होता और पूरी दुनिया शोक व्यक्त कर रही होती।

यह समय हिंदू-मुस्लिम करने का नहीं है और न ही किसी मुस्लिम नेता की मृत्यु पर खुश होने का समय है, बल्कि आत्ममंथन का समय है। खाड़ी देशों में मुस्लिम संगठन होने के बावजूद भी ईरान आज अकेला दिखाई दे रहा है। गाजा, लेबनान, सीरिया और जॉर्डन के बाद अब ईरान का नंबर आया है। अफगानिस्तान और इराक पहले ही अमेरिका की कार्रवाई झेल चुके हैं।

पाकिस्तान, जो स्वयं को अक्सर मुस्लिम देशों का नेता बताने की कोशिश करता है, आज चुप क्यों है? मुस्लिम देशों में पाकिस्तान ही वह देश है जिसके पास परमाणु शक्ति है। 2026 में वेनेजुएला के बाद ईरान दूसरा देश है जिसके सर्वोच्च नेता को मारा गया है। आशंका है कि अभी और देशों पर भी अमेरिका की नजर हो सकती है।

मध्य-पूर्व में संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका इज़रायल को प्रत्यक्ष समर्थन देता है। यदि ईरान के पास परमाणु हथियार होते तो शायद स्थिति अलग होती और दुनिया हमला करने से पहले कई बार सोचती। ऐसा नहीं है कि ईरान ने प्रयास नहीं किया, परंतु प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उसका परमाणु कार्यक्रम सफल नहीं हो सका।

दुनिया में जिस देश को स्वयं को सुरक्षित रखना है, उसके लिए आत्मनिर्भर होना अत्यंत आवश्यक है।

“एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” (Axis of Resistance) का कमजोर होना

ईरान ने दशकों से मध्य-पूर्व में अपने प्रभाव के लिए एक नेटवर्क तैयार किया था, जिसमें हिजबुल्लाह (लेबनान), हमास (गाजा) और हूती (यमन) शामिल थे। 2024-25 में सीरिया में बशर अल-असद शासन के पतन के बाद ईरान का एक बड़ा सहयोगी समाप्त हो गया। इज़रायली हमलों में हिजबुल्लाह और हमास के कई बड़े नेताओं के मारे जाने से ईरान की क्षेत्रीय स्थिति कमजोर हुई है।

फरवरी 2026 के अंत में जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों और नेतृत्व पर बड़े हमले किए, तो ईरान ने इसके जवाब में “आक्रामक आत्मरक्षा” (Aggressive Self-Defense) की नीति अपनाई। ईरान का मानना है कि जो पड़ोसी देश (जैसे UAE, बहरीन, कतर) अपनी धरती पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को जगह देते हैं, वे परोक्ष रूप से अमेरिका का समर्थन करते हैं।

OIC क्या कर रहा है?

OIC (Organization of Islamic Cooperation) आमतौर पर किसी सदस्य देश के युद्ध में सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं करता। यह एक राजनीतिक और राजनयिक संगठन है, न कि सैन्य गठबंधन। इसके सदस्य देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित होते हैं, इसलिए इसकी प्रतिक्रिया अक्सर सर्वसम्मति पर निर्भर करती है। OIC के पास संयुक्त सेना या अनिवार्य कार्रवाई की शक्ति नहीं है।

खाड़ी देशों (GCC) का रुख “अपनी सुरक्षा सर्वोपरि” पर आधारित है। वे ईरान की मिसाइल गतिविधियों और क्षेत्रीय हस्तक्षेप की आलोचना करते हैं, पर साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता भी चाहते हैं।

मुस्लिम जगत में इस मुद्दे पर मतभेद हैं। कुछ लोग ईरान के “प्रतिरोध की धुरी” का समर्थन करते हैं, जबकि कुछ संगठन इसे आधुनिक उपनिवेशवाद की संज्ञा देते हैं। आम राय यह है कि ईरान का भविष्य वहाँ के लोगों को तय करना चाहिए, न कि बाहरी हस्तक्षेप से।

अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई, सेना प्रमुख अब्दुल रहीम मौसवी, रक्षा मंत्री मेजर जनरल अज़ीज़ नासिरज़ादेह, तथा रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपोर और अन्य वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं।

पूरी दुनिया में वर्तमान हालात तनावपूर्ण हैं और स्थिति युद्ध जैसी प्रतीत होती है। फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी।

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